समाज , परिवार और शिक्षा

जनवाद टाइम्स डॉक्टर महेंद्र कुमार निगम : समाज सामाजिक संबंधों का जाल है. परिवार नागरिकता की प्रथम पाठशाला है. बालक के व्यक्तित्व के विकास के लिए परिवार का अहम योगदान होता है. समाज में प्रत्येक बालक और बालिका को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए भारतीय संविधान के भाग 3 में समान अधिकार प्राप्त है. सामाजिक और संवैधानिक मान्यता प्राप्त होने के बाद भी क्या आज समाज में प्रत्येक बालक और बालिका अपने व्यक्तित्व का विकास सही दिशा में  ज्ञान प्राप्त कर पा रहे हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है. क्या अपने बालक और बालिका को एक नामी स्कूल में प्रवेश दिला देना ही उसके व्यक्तित्व के विकास का मूल आधार है. भौतिकवादी और वैश्वीकरण के युग में हम सभी अपने बच्चों को संस्कार नहीं दे पा रहे हैं जो उन्हें मिलना चाहिए, जिसका मूल कारण आज की भौतिकवादी संस्कृति है. पहले समाज में गांव का प्रत्येक व्यक्ति गांव के प्रत्येक बच्चे अपना बच्चा समझता था और उसकी गलतियों की तरफ संकेत करता था. लेकिन आज के पढ़े-लिखे जिम्मेदार व्यक्ति समाज के अन्य बच्चों की गलतियों की तरफ संकेत की बात तो दूर अपने बच्चे की गलती को भी स्वीकार नहीं करते. हम अपने बच्चों के प्रति कर्तव्य को भूल जाते हैं. बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ सामाजिक संबंधों के बारे में अज्ञानता का बोध नहीं कराते हैं विद्यालय और शिक्षक के साथ बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में परिवार की अपनी अहम भूमिका होती है. बालक की किशोरावस्था एक तूफान  के समान होती है. इस इस अवस्था में बालक को सही और गलत का सूक्ष्म ज्ञान नहीं होता है. इसी  अज्ञानता के कारण बालक भविष्य में बड़ी गलती कर देता है जिसका खामियाजा परिवार और समाज दोनों को भुगतना पड़ता है. भौतिकवादी युग इस युग में मर्यादा दूर होती जा रही है और उसके स्थान पर आज भौतिकवादी संस्कृति हावी होती चली जा रही है. इस संस्कृति को बढ़ावा देने में समाज के भौतिकवादी प्रबुद्ध जन अहम भूमिका निभा रहे हैं. किशोरावस्था में बच्चे को महंगा फोन देना खतरे से खाली नहीं है. किशोरावस्था मैं बालक और बालिका को सामाजिक संबंधों की मर्यादा के बारे में बताना जरूरी है. अगर आज कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति से संस्कृति के   बात करता है तो उसे पुरातनवादी बताकर उसका उपहास किया जाता है. व्यक्ति बच्चे के अच्छे परवरिश की बात तो करता है लेकिन अपने कर्तव्यों को भूल जाता है. आज बढ़ती महंगाई के कारण स्त्री और पुरुष दोनों का कामकाजी होना जरूरी हो गया है जिसके कारण भी हम अपने बच्चों को सही समय नहीं दे पाते हैं. बच्चे स्कूल और ट्यूशन के सहारे किताबी ज्ञान तो प्राप्त कर लेते हैं लेकिन उन्हें सामाजिक संबंधों का सही ज्ञान प्राप्त नहीं होता उसे मिलना चाहिए. आगरा के संजलि हत्याकांड 18 दिसंबर की घटना  भी सामाजिक संबंधों के अज्ञानता और समाज के प्रत्येक व्यक्ति और परिवार के कर्तव्य की अज्ञानता की ओर संकेत करता है. भारतीय विश्वविद्यालय और महाविद्यालय के के पाठ्यक्रमों में बदलाव की जरूरत है जिससे हम शिक्षार्थी को सही दिशा मैं ले जा सके.


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